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Tuesday, May 6, 2014

Are you using your potential

बहुत समय पहले की बात है , एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किये । वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे , और राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे।

राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को नियुक्त कर दिया।

जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन बनाया , और उस जगह पहुँच गए जहाँ उन्हें पाला जा रहा था। राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार लग रहे थे ।

राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे आदमी से कहा, ” मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूँ , तुम इन्हे उड़ने का इशारा करो । “

आदमी ने ऐसा ही किया।

इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे , पर जहाँ एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था , वहीँ दूसरा , कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था।

ये देख , राजा को कुछ अजीब लगा.

“क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है वहीँ ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा ?”, राजा ने सवाल किया।

” जी हुजूर , इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है , वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं।”

राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे , और वो दुसरे बाज को भी उसी तरह उड़ना देखना चाहते थे।

अगले दिन पूरे राज्य में ऐलान करा दिया गया कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊँचा उड़ाने में कामयाब होगा उसे ढेरों इनाम दिया जाएगा।

फिर क्या था , एक से एक विद्वान् आये और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे , पर हफ़्तों बीत जाने के बाद भी बाज का वही हाल था, वो थोडा सा उड़ता और वापस डाल पर आकर बैठ जाता।

फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ , राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आसमान में उड़ रहे हैं। उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था।

वह व्यक्ति एक किसान था।

अगले दिन वह दरबार में हाजिर हुआ। उसे इनाम में स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के बाद राजा ने कहा , ” मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ , बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान् नहीं कर पाये वो तुमने कैसे कर दिखाया। “

“मालिक ! मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ , मैं ज्ञान की ज्यादा बातें नहीं जानता , मैंने तो बस वो डाल काट दी जिसपर बैठने का बाज आदि हो चुका था, और जब वो डाल ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा। “

दोस्तों, हम सभी ऊँचा उड़ने के लिए ही बने हैं। लेकिन कई बार हम जो कर रहे होते है उसके इतने आदि हो जाते हैं कि अपनी ऊँची उड़ान भरने की , कुछ बड़ा करने की काबिलियत को भूल जाते हैं। यदि आप भी सालों से किसी ऐसे ही काम में लगे हैं जो आपके सही potential के मुताबिक नहीं है तो एक बार ज़रूर सोचिये कि कहीं आपको भी उस डाल को काटने की ज़रुरत तो नहीं जिसपर आप बैठे हुए हैं ?

Monday, April 28, 2014

Indian muslims need to introspect

Indian Muslims are today at a crossroad. They may vote for the same parties that have promised them heaven and given them nothing in return, or they can show that they are Indian first and Muslims second. They should look towards the USA, instead of hating them : there, people of Mexican, Korean, African origins, Christians, Muslims or Buddhists, feel that they are First Americans.

 The question that Indian Muslims should ask themselves today is simple: “who are we” ? Amongst the 150 millions of Muslims in India, only a tiny percentage descends from the Turks, Afghans, or Iranians who invaded India. The majority of them are converted Muslims. And converted how ? By terror, coercion, force, bloodshed. The ancestors of today’s Indian Muslims are probably those who suffered the most from the Arab and Muslim invasions. Those Hindus and Sikhs who chose not to convert, took refuge in their faith, fought together and kept their pride and honor. The first two generations of those who converted must have endured hell: for they certainly did not convert out of conviction, but because they had no choice: their daughters and wives were raped, sons taken into slavery, parents killed. It is sad today that their descendants have sometimes made theirs the intolerant cry of Islam.

It is true that many Indian Muslims were Hindu intouchables. Marxists would like us to believe that they converted because they thought that they would access the more egalitarian society of Islam. What rubbish! Does one think in that way in time of war, terror and tears ? Do today’s Hindu lower castes convert to Islam when there is no more violent coercion? More likely, the Intouchables were the most vulnerable, the least apt to defend themselves; they had neither the faith of the brahmins, nor the riches of the vaishiyas, nor the military skill of the kshatriyas.

Do Indian Muslims understand that they were part of the richest, most advanced, most tolerant and generous civilization of ancient times. That their culture was so advanced that it had spread all over the world ?Do they realize that more and more archeological an historical discoveries are pointing out that the genocide of Hindus by Muslim invaders is without parallel. The conquest of Afghanistan in the year 1000, was followed by the annihilation of the entire Hindu population there; indeed, the region is still called Hindu Kush, ‘Hindu slaughter’. The Bahmani sultans in central India, made it a rule to kill 100.000 Hindus a year. In 1399, Teimur killed 100.000 Hindus in a single day. Professor K.S. Lal has estimated that the Hindu population decreased by 8O million between the year 1000 and 1525, probably the biggest holocaust in history. Surely, many of present day Indian Muslims’ ancestors must have been among those slaughtered.

 Islam cannot be wished away. As Sri Aurobindo said “Mahomed’s mission was necessary, else we might have ended by thinking, in the exaggeration of our efforts at self-purification, that earth was meant only for the monk and the city created as a vestibule for the desert”…. . Thus Indian Muslims have to keep their faith and any attempt by Hindus to convert them back is not only futile but counterproductive. But the question to be asked to them is: “what kind of Islam do you want to practice ? An Islam which looks westwards, towards a foreign city, the Mecca, swears by a Scripture, the Koran, which is not only not relevant to India, but which was meant for people living 1500 years ago, in a language which is not Indian ? Or do they want to practice an Islam which is “Indianized”, which accepts the reality of other Gods, as Hinduism and Buddhism accept that there have been other avatars than Ram or Buddha.

 Do India Muslims want to worship Babar, a man who destroyed everything which was good, beautiful and holy and lived by the power of violence, or do they want to imbibe the qualities of Ram, who believed in the equality of all, who gave-up all riches and honors of the world because he thought his bother deserved the throne more than him ?

Whatever the West says, which is obsessed with China, India, a vibrant, English speaking, pro-western democracy is going to become the superpower of the 21st century. Do Indian Muslims want to participate in that great adventure ? Do they want to feel that they are part of India, that they are Indians ?

Nowadays it is politically not correct to say anything against Islam. You are immediately labeled anti-Muslim and dismissed as a “rightist”. No matter if you are only reporting the fact that there is a real problem with Islam in South Asia: that India is surrounded by fundamentalists sates: Afghanistan and Pakistan, while more moderates like Bangladesh, tend to close an eye to anti-Indian activities; that Indian Muslims sometimes tend to put their religion before their country; and that Kashmiris, far from being the persecuted that the Foreign Press likes to portray, are actually paying the price for having allowed Afghan and Pakistani Sunnis radicalize what used to be a more gentle and tolerant Islam and left their Hindu brothers and sisters being butchered and chased away from their ancestral land.

Thus the question has to be asked again: do Indian Muslims want to be like Babar or like Ram. This choice will shape their future for generations to come.

 Francois Gautier

Thursday, April 24, 2014

Katha kahani (bodh katha mamta)

एक बार की बात है इन्दौर नगर के
किसी मार्ग के किनारे एक गाय अपने बछड़े
के
साथ खड़ी थी, तभी देवी अहिल्याबाई के
पुत्र
मालोजीराव अपने रथ पर सवार होकर गुजरे

मालोजीराव बचपन से ही बेहद शरारती व
चंचल प्रवृत्ति के थे । राह चलते
लोगों को परेशान करने में उन्हें विशेष आंनद
आता था । गाय का बछड़ा अकस्मात
उछलकर उनके रथ के सामने आ गया । गाय
भी उसके पीछे दौड़ी पर तब तक
मालोजी का रथ बछड़े के ऊपर से निकल
चुका था । रथ अपने पहिये से बछड़े
को कुचलता हुआ आगे निकल गया था ।
गाय बहुत देर तक अपने पुत्र की मृत्यु पर
शोक मनाती रही । तत्पष्चात उठकर
देवी अहिल्याबाई के दरबार के बाहर टंगे उस
घण्टे के पा जा पहुँची, जिसे अहिल्याबाई ने
प्राचीन राजपरम्परा के अनुसार त्वरित
न्याय
हेतु विशेष रूप से लगवाया था, अर्थात् जिसे
भी न्याय की जरूरत होती,वह जाकर उस
घन्टें
को बजा देता था, जिसके बाद तुरन्त दरबार
लगता था और तुरन्त न्याय मिलता।
घण्टे की आवाज सुनकर देवी अहिल्याबाई ने
ऊपर से एक विचित्र दृश्य देखा कि एक गाय
न्याय का घन्टा बजा रही है । देवी ने तुरन्त
प्रहरी को आदेश दिया कि गाय के मालिक
को दरबार में हाजिर किया जाये। कुछ देर
बाद
गाय का मालिक हाथ जोड़ कर दरबार में
खड़ा था। देवी अहिल्याबाई ने उससे
कहा कि '' आज तुम्हारी गाय ने स्वंय आकर
न्याय की गुहार की है । जरूर तुम
गौ माता को समय पर चारा पानी नही देते
होगे।
''
उस व्यक्ति ने हाथ जोड़कर कहा कि माते
श्री ऐसी कोई बात नही है ।
गौ माता अन्याय
की शिकार तो हुई है ,परन्तु उसका कारण
मैं नही कोई ओर है, उनका नाम बताने में मुझे
अपने प्राण का भय है ।''
देवी अहिल्या ने कहा कि अपराधी जो कोई
भी है उसका नाम निडर होकर बताओं ,
तुम्हें हम अभय -दान देते हैं। '' तब उस
व्यक्ति ने पूरी वस्तुस्थित कह सुनायी। अपने
पुत्र को अपराधी जानकर देवी अहिल्याबाई
तनिक भी विचलीत नही हुई और फिर
गौ माता स्वयं उनके दरबार में न्याय
की गुहार
लगाने आयी थी। उन्होंने तुरन्त
मालोजी की पत्नी मेनावाई को दरबार में
बुलाया यदि कोई व्यक्ति किसी माता के
पुत्र
की हत्या कर दे ,तो उसे क्या दण्ड
मिलना चाहिए ?
मालो जी की पत्नी ने कहा कि - जिस
प्रकार
से हत्या हुई, उसी प्रकार उसे भी प्राण-
दण्ड
मिलना चाहिए। देवी अहिल्या ने तुरन्त
मालोजी राव का प्राण- दण्ड सुनाते हुए
उन्हें
उसी स्थान पर हाथ -पैर बाँधकर
उसी अवस्था में मार्ग पर डाल दिया गया।
रथ
के सारथी को देवी ने आदेश दिया ,पर
सारथी ने हाथ जोड़कर कहा ''
मातेश्री ,मालोजी राजकुल के एकमात्र कुल
दीपक है। आप चाहें तो मुझे प्राण -दण्ड दे
दे,किन्तु मैं उनके प्राण नहीं ले सकता ।''
तब देवी अहिल्याबाई स्वंय रथ पर सवार हुई
और मालोजी की ओर रथ को तेजी से
दौड़ाया,
तभी अचानक एक अप्रत्याशित घटना हुई।
रथ
निकट आते ही फरियादी गौ माता रथ
के निकट आ कर खड़ी हो गयी ।
गौ माता को हटाकर देवी ने फिर एक बार
रथ
दौड़ाया , लेकिन फिर से गौ माता रथ के
सामने
आ खड़ी हो गयी। सारा जन
समुदाय गौ माता और उनके ममत्व की जय
जयकार कर उठा।
देवी अहिल्या की आँखो से
भी अश्रुधारा बह निकली। गौ माता ने स्वंय
का पुत्र खोकर भी उसके हत्यारे के प्राण
ममता के वशीभूत होकर बचाये। जिस स्थान
पर गौ माता आड़ी खड़ी हुई थी,
वही स्थान
आज इन्दौर में ( राजबाड़ा के पास)
''आड़ा बाजार'' के नाम से जाना जाता है।

Sunday, April 20, 2014

AB modi aane wala hai

जिधर देखता हूँ तेरी तस्वीर नजर आती है....!
मुझे अपने भारत की बुलंद तक़दीर नजर आती हैं....!!
लोग कहते हैं कि अबकी बार मोदी सरकार....!
मुझे तो अगली हर सरकार मोदी सरकार नजर आती है..!!
कुछ तो असर हो रहा है, नमो तेरा ज़िक्र हर शहर मे हो रहा है.
जो बेफिक्र बैठे थे, सत्ता के नशे में, उनके सर में भी अब दर्द हो रहा है..
कितना दम है अब देखेंगे पाकिस्तानी बिल्ली में,
थोड़ा ठहरो अब शेरों का राजचलेगा दिल्ली में।
चप्पा-चप्पा भारत माँ के जयकारों सेगूंजेगा,
जर्रा-जर्रा इन्कलाब वाले नारों सेगूंजेगा ।
हर चौराहा गूंज उठेगा जन गण मन केनारों से,
संभव है तो देश बचालो भारत केगद्दारों से ।।
बहुत हो चुका भ्रष्टाचार..अब पँजा जाने वाला है,
भारत माँ की रक्षा करने
अब मोदी आने वाला है।
अब मोदी आने वाला है।

Tuesday, October 30, 2012

नीतिन गडकरी, रॉबर्ट वढेरा और भारत सरकार – मा. गो. वैद्य

इस विषय पर नहीं लिखना, ऐसा मैंने तय किया था. ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन’के नेता अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी पर, एक विशेष पत्रपरिषद में जो आरोप किए, उस बारे में गत सप्ताह ही ‘भाष्य’में लेख आया था. ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’में भी उस बारे में विस्तारपूर्वक समाचार प्रकाशित हुआ था; ‘पीटीआय’ वृत्तसंस्था ने भी मेरा अभिप्राय लेकर समाचारपत्रों को भेजा था. लेकिन गडकरी पर नए आरोप किए गए है. वह किसी व्यक्ति ने या संगठन ने नहीं किए. वह कुछ प्रसार माध्यमों की करामत दिखती है. अच्छी बात है. ‘शोध पत्रकारिता’ यह पत्रकार जगत का एक खास भाग है. इस कारण उस माध्यम के विरुद्ध शिकायत करने का प्रयोजन नहीं.
अंतर
आश्‍चर्य इस बात का है कि, सरकार ने तुरंत इसकी दखल ली. ११ अगस्त २०१२ को मुसलमानों में के आतंवादियों ने सीधे पुलिस पर किए हमले की भी इतनी शीघ्रता से, केन्द्र सरकार ने, दखल लेने का समाचार नहीं. लेकिन गडकरी के विरुद्ध के आरोप मानो हमारे देश पर आई एक भीषण आपत्ति है, ऐसा मानकर सरकार ने उन आरोपों की शीघ्रता से दखल ली. कंपनी व्यवहार विभाग के मंत्री वीरप्पा मोईली ने कहा, ‘‘इस मामले की हम ‘डिस्क्रीट इन्क्वायरी’ करेंगे.’’ हमारी अंग्रेजी कुछ कमजोर है, इसलिए ‘डिस्क्रीट ’ शब्द का अर्थ अंग्रेजी शब्दकोश में देखा. वहॉं ‘डिस्क्रीट ’का ‘न्यायपूर्ण और समझदारीपूर्ण’ ऐसे अर्थ मिले. ठीक लगा. अनेक गंभीर विषयों पर मौन का आसरा लेने वाली हमारी इस सरकार को ‘न्याय’ और समझदारी से भी लगाव है, यह पता चला. लेकिन यह समाधान बहुत ही अल्पजीवी साबित हुआ. कारण, कॉंग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गॉंधी के दामाद रॉबर्ट वढेरा की जॉंच क्यों नहीं, ऐसा जब किसी ने मोईली से पूछा, तब उनका उत्तर था कि, वढेरा का मामला अलग है. और क्या या सही नहीं है? वढेरा सोनिया गॉंधी के दामाद है; और गडकरी नहीं. पल भर के लिए मान ले कि, नीतिन गडकरी सोनिया जी के दामाद होते, तो मोईली का विभाग इतनी शीघ्रता से सक्रिय होता? और क्या यह भी सच नहीं है कि, कहॉं वढेरा और कहॉं गडकरी? एक है केन्द्र मेंे की सत्तारूढ पार्टी के अध्यक्ष के सम्मानीय दामाद, तो दूसरे है विपक्ष के सामान्य अध्यक्ष!
डर किस बात का?
मैं केजरीवाल की बात समझ सकता हूँ. उन्हें अपनी नई पार्टी की प्रतिष्ठापना करनी है. विद्यमान राजनीतिक पार्टिंयॉं किस प्रकार दुर्गुणों से सनी है, यह बताने के लिए उन्होने कीचड़ उछालना स्वाभाविक मानना चाहिए. लेकिन कॉंग्रेस ने गडकरी से डरने का क्या कारण है? जेठमलानी की छटपटाहट समझी जा सकती है. वे बेचारे राज्य सभा के सामान्य सदस्य है. पार्टी के संगठन में या संसदीय दल में उन्हें विशेष स्थान नहीं. इसका कारण, गडकरी अध्यक्ष है, ऐसी उनकी गलतफहमी हो सकती है. और गडकरी ही फिर तीन वर्ष अध्यक्ष रहे, तो उनकी ऐसी ही दुदर्शा होती रहेगी, ऐसा उन्हें लगता हो तो इसमें अनुचित कुछ भी नहीं. लेकिन कॉंग्रेस क्यों अस्वस्थ हो रही है? बेताल बड़बड़ाने के लिए विख्यात कॉंग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने डरने का क्या कारण है? गनीमत है कि, उन्होंने कॉंग्रेस के महासचिव के नाते प्रधानमंत्री से गडकरी के मामले की जॉंच करने के लिए पत्र नहीं लिखा. वे कहते है, मैंने व्यक्तिगत रूप में वह पत्र लिखा है. लेकिन, दिग्विजय सिंह जी, सीधे प्रधानमंत्री को यह पत्र भेजने की क्या आवश्यकता थी? क्या यह पाकिस्तान या चीन ने भारत पर हमला करने जैसा गंभीर मामला है? और आपकी सरकार उसे गंभीरता से नहीं लेगी, ऐसा आपको लगता है? लेकिन दिग्विजय सिंह जैसे बेताल नेता को यह पूछने से कोई उपयोग नहीं. फिर भी, यह पूछा जा सकता है कि, २ जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रकुल क्रीड़ा घोटाला, कोयला बटँवारा घोटाला, वढेरा का घोटाला, इस बारे में आपने व्यक्तिगत स्तर पर ही सही, कोई पत्र भेजने की जानकारी नहीं. क्या गडकरी का आरोपित घोटाला, इनसब घोटालों से भयंकर है?
पक्षपाती सरकार
दि. २४ को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विजयादशमी उत्सव समाप्त होते ही, प्रसार माध्यमों के प्रतिनिधि संघ के प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य से मिले, और उनसे गडकरी के तथाकथित घोटाले से संबंधित प्रश्‍न पूछा. उन्होंने उत्तर दिया कि, यह ‘मिडिया ट्रायल’ है. मतलब प्रसार माध्यमों ने शुरु किया मुकद्दमा. उन्होंने क्या गलत कहा? किसने खोज निकाला यह तथाकथित घोटाला? और किसने इस घोटाले को भरपूर कर प्रसिद्धि दी? प्रसारमाध्यमों ने ही! वढेरा का घोटाला सूचना अधिकार कानून से बाहर आया. अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक रूप में उनके ऊपर आरोप किए है. क्या प्रतिक्रिया थी कॉंग्रेस की? सही कहे तो भारत सरकार की? स्वयं प्रधानमंत्री ने सूचना का अधिकार आकुंचित करने का मानस प्रकट किया. उन्होंने कहा, वह कायदा व्यक्ति के नीजि जीवन पर अतिक्रमण कर रहा है; उसे मर्यादा लगानी होगी. प्रधानमंत्री ने किए इस वक्तव्य को वढेरा के घोटाले – जो सूचना अधिकार कानून के माध्यम से प्रकट हुए – की पृष्ठभूमि थी. वह एक व्यक्ति का नीजि मामला था, तो फिर उनके बचाव के लिए सलमान खुर्शीद, पी. चिदंबरम्, अंबिका सोनी, जयंती नटराजन्, वीरप्पा मोईली, इन मंत्रियों ने दौैडकर आने का क्या कारण? वढेरा का मामला, वैसे तो कॉंग्रेस का भी मामला नहीं. एक नीजि व्यक्ति का मामला है. उनके लिए कॉंग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी और राजीव शुक्ला ने स्पष्टीकरण देने का क्या कारण? क्या गडकरी का पूर्ति उद्योग सरकारी उद्योग है? या भाजपा का उद्योग है? या, जिन्होंने सरकार से शिकायत कर जॉंच की मांग की है, वे उस उद्योग के भागधारक है? समाचारपत्रों में छपे समाचारों के आधार पर निर्णय लेने की अपेक्षा, सरकार ने पारित किये कानून से जो सामने आया है, और जो पहली नज़र में तो समर्थनीय लगता है, उस बारे में तुरंत निर्णय लेना उचित सिद्ध होता. लेकिन सरकार ने वह नहीं किया. विपरीत सरकार ने अपनी कृति से वह पक्षपाती है यह सिद्ध किया है.
जबाब दो
लेख के आरंभ में ही मैंने कहा है कि, इस विषय पर लिखने का मेरा विचार नहीं था. लेकिन २५ अक्टूबर को तीन चैनेल के प्रतिनिधि मुझसे मिलने घर आये थे. पहले ‘ई टीव्ही’वाले आये, फिर ‘आज तक’के और अंत में ‘एनडीटीव्ही’के. सब के प्रश्‍न गडकरी पर लगे आरोपों के बारे में थे. ‘एनडीटीव्ही’के प्रतिनिधि के आने तक मुझे, आयकर विभाग की जॉंच शुरू होने की जानकारी नहीं थी. वह जानकारी उन्होंने दी. मैंने कहा, हो जाने दो जॉंच. सरकारी कंपनी विभाग जॉंच करेगा, ऐसी जानकारी मिलने के बाद गडकरी लापता नहीं हुए या उन्होंने मौन भी धारण नहीं किया. उन्होंने कहा, अवश्य जॉंच करो. वढेरा की है ऐसा कहने की हिंमत? खुर्शीद-चिदंबरम् और अन्य मंत्रियों की है यह हिंमत? या मनीष तिवारी और कॉंग्रेस के दूसरे प्रवक्ताओं के मुँह से ऐसे हिम्‍मतपूर्ण शब्द क्यों नहीं निकलते? इस स्थिति में, वढेरा के विरुद्ध के आरोपों पर से जनता और प्रसार माध्यमों का ध्यान हटाने के लिए, किसी प्रसारमाध्यम को अपने साथ मिलाकर, कॉंग्रेस ने, गडकरी के विरुद्ध के तथाकथित आरोपों का ढिंढोरा पिटना शुरू किया है, ऐसा आरोप किसी ने किया तो उसे कैसे दोष दे सकते है? किसी चोरी का समर्थन करने के लिए, दूसरा भी चोर है, ऐसा चिल्ला चिल्ला कर बताना उचित है? दूसरा कोई चोर होगा, तो उसे सज़ा दो; लेकिन इससे पहला चोर निर्दोष कैसे सिद्ध होता है? कॉंग्रेस के प्रवक्ता, मोईली जैसे ज्येष्ठ नेता और दिग्विजय सिंह जैसे बेताल नेताओं ने इसका जबाब देना चाहिए.
मुझसे पूछे गए प्रश्‍न
दूरदर्शन चॅनेल वालों ने मुझे जेठमलानी के वक्तव्य के बारे में भी प्रश्‍न पूछे. मैंने कहा, ‘‘यह उनका व्यक्तिगत मत है. ऐसा मत रखने और उसे प्रकट करने का उन्हें अधिकार है. लेकिन गडकरी त्यागपत्र दे, ऐसा पार्टी का मत होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता. गडकरी ने किसी भी जॉंच के लिए तैयारी दिखाने पर स्वयं अडवाणी ने उनकी प्रशंसा की है; और भाजपा में जेठमलानी की अपेक्षा, अडवानी के मत को अधिक वजन है. श्रीमती सुषमा स्वराज ने भी, ऐसा ही प्रतिपादन किया है.’’
दूसरा प्रश्‍न पूछा गया कि, इन आरोपों के कारण, गडकरी का दुबारा पार्टी अध्यक्ष बनना कठिन हुआ है? मैंने उत्तर दिया, ‘‘मुझे ऐसा नहीं लगता. अपने पार्टी का संविधान कैसा हो, उसमें कब और क्या संशोधनकरे, यह उस पार्टी का प्रश्‍न है; और संविधान संशोधन यह क्या कोई अनोखी बात है? हमारे देश के महान् विद्वानों ने तैयार किए हमारे संविधान में गत ६५ वर्षों में सौ से अधिक संशोधन हुए है. पहला संशोधन तो संविधान पारित करने के एक वर्ष से भी कम समय में ही करना पड़ा था. भाजपा ने अपने अधिकार में संविधान संशोधन किया और गडकरी के पुन: अध्यक्ष बनने का रास्ता खुला किया, इसमें अन्य किसी ने आक्षेप लेने का क्या कारण है? और यह संविधान संशोधन केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए ही नहीं. सब पदाधिकारियों के लिए है.’’
बदनामी में ही दिलचस्वी
मैंने यह भी कहा कि, आपको जो गैरव्यवहार लगते है, उनका संबंध ठेकेदार म्हैसकर से है. किसी ने कहा है कि, गलत पते दिये है. मैंने पूछा, क्या पूर्ति उद्योग ने गलत पते दिये है? फिर जॉंच म्हैसकर की करो. लेकिन इसमें लोगों को दिलचस्वी होने का कारण नहीं. दिलचस्वी गडकरी को बदनाम करने में है. इसलिए यह सब भाग-दौड चल रही है. प्रकाशित हुए समाचारों से जानकारी मिलती है कि, म्हैसकर की कंपनी ने १६४ करोड़ रुपये कर्ज पूर्ति उद्योग समूह को दिया. उस कर्ज पर १४ प्रतिशत ब्याज लगा है. पूर्ति उद्योग ने उस कर्ज में से ८० करोड़ रुपयों का भुगतान, ब्याज के साथ किया है. यह कर्ज २००९ में दिया गया है. ऐसा मान ले कि, गडकरी ने सार्वजनिक निर्माण मंत्री रहते समय म्हैसकर को उपकृत किया था. लेकिन गडकरी का मंत्री पद १९९९ में ही गया. उस गठबंधन की सरकार ही नहीं रही. १३ वर्ष तक उन तथाकथित उपकारों की याद रखकर म्हैसकर ने यह कर्ज दिया, ऐसा जिसे मानना है, वह माने. लेकिन मेरे जैसे सामान्य बुद्धि के मनुष्य तो को इसमें कोई साठगॉंठ नहीं दिखती.
संघ के संबंध में
फिर मुझे संघ के संबंध में प्रश्‍न पूछा गया. इस बारे में संघ को क्या लगता है? मैंने उत्तर दिया, ‘‘संघ को कुछ लगने का संबंध ही कहा है? भाजपा अपना कारोबार देखने के लिए सक्षम है. स्वायत्त है. पार्टी को जो उचित लगेगा, वह निर्णय लेगी.’’ इस प्रश्‍न की पृष्ठभूमि, शायद २४ अक्टूबर के ’इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित समाचार की हो सकती है. उस समाचार में कहा गया है कि, २ और ४ नवंबर को चेन्नई में संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक है, उसमें इस मामले की चर्चा होगी. कार्यकारी मंडल की बैठक कब और कहॉं है, इसकी मुझे जानकारी नहीं थी. लेकिन मुझे निश्‍चित ऐसा लगता है कि, उस बैठक में इस मामले की चर्चा होने का कारण नहीं. तथापि संघ को इस विवाद में लपेटे बिना, कुछ लोगों का समाधान नहीं होगा. गुरुवार को झी चॅनेल के प्रतिनिधि ने दूरध्वनि कर, मुझे महाराष्ट्र प्रदेश कॉंग्रेस के अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे ने संघ पर लगाए आरोपों की जानकारी दी. मैंने सायंकाल सात बजे सह्याद्री चैनेल के समाचार सुने. उनमें माणिकराव के आरोपों का समाचार था. ठाकरे का आरोप है कि, गडकरी सार्वजनिक निर्माण मंत्री थे, उस समय उन्होंने, संघ के कार्यालय के भवन के लिए पैसे दिये. संघ के कार्यालय का कौनसा भवन? यह ठाकरे ने नहीं बताया. क्योंकि वे बता ही नहीं सकते. संघ कार्यालय का जो भवन महल भाग में है और जो डॉ. हेडगेवार भवन के नाम से प्रसिद्ध है, उसका निर्माण १९४६ में ही पूर्ण हुआ था. उस समय गडकरी का जन्म भी नहीं हुआ था. शायद माणिकराव का भी नहीं हुआ होगा. फिर इस पुराने भवन की कुछ पुनर्रचना की गई. वह २००६ में. उस समय गडकरी कहॉं मंत्री थे? रेशिमबाग में का नया निर्माण कार्य गत एक-दो वर्षों में का है. ठाकरे प्रदेश कॉंग्रेस कमेटी के अध्यक्ष इस जिम्मेदारी के पद पर है; उन्होंने अक्ल का ऐसा दिवालियापन प्रदर्शित करना ठीक नहीं. हॉं, यह संघ को भी इस विवाद में लपेटने का उनका, मतलब कॉंग्रेस का प्रयास हो सकता है. लेकिन वह सफल नहीं होगा. संघ को पैसा कौन देता है, यह नागपुर के समीप यवतमाल में जिंदगी गुजारने वाले माणिकराव को पता नहीं होगा, तो उनकीमूढता पर दया करना ही योग्य है. उन्हें उत्तर देना निरर्थक है.
तात्पर्य
तात्पर्य यह कि, भारत सरकार ने गडकरी पर लगे आरोपों के संदर्भ में जो तत्परता दिखाई, वैसी ही वढेरा पर लगे आरोपों के बारे में भी दिखाए. गडकरी जैसे जॉंच का सामना कर रहे है, वैसा ही वढेरा भी करे. जॉंच से भागना उन्हें शोभा नहीं देता, और सरकार ने उनका समर्थन करना तो सरकार को भी शोभा नहीं देता.

Monday, August 27, 2012

हिन्दू होने की सजा

प्रकृति कभी भी किसी से कोई भेदभाव नहीं करती और इसने सदैव ही इस धरा पर मानव-योनि  में जन्मे सभी मानव को एक नजर से देखा है. हालाँकि मानव ने समय - समय पर अपनी सुविधानुसार दास-प्रथा, रंगभेद-नीति, सामंतवादी इत्यादि जैसी व्यवस्थाओं के आधार पर मानव-शोषण की ऐसी कालिमा पोती है जो इतिहास के पन्नो से शायद ही कभी धुले. समय बदला. लोगो ने ऐसी अत्याचारी व्यवस्थाओं के विरुद्ध आवाज उठाई. विश्व के मानस पटल पर सभी मुनष्यों को मानवता का अधिकार देने की बात उठी परिणामतः विश्व मानवाधिकार का गठन हुआ और वर्ष 1950 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रत्येक वर्ष की 10 दिसंबर को विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाने का तय किया गया. मानवाधिकार के घोषणा-पत्र में साफ शब्दों में कहा गया कि मानवाधिकार हर व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है ,जो प्रशासकों द्वारा जनता को दिया गया कोई उपहार नहीं है तथा इसके मुख्य विषय शिक्षा ,स्वास्थ्य ,रोजगार, आवास, संस्कृति ,खाद्यान्न व मनोरंजन इत्यादि से जुडी मानव की बुनयादी मांगों से संबंधित होंगे.

1947 में भारत का भूगोल बदला. पाकिस्तान के प्रणेता मुहमद अली जिन्ना को पाकिस्तान में हिन्दुओं के रहने पर कोई आपत्ति नहीं थी ऐसा उन्होंने अपने भाषण में भी कहा था क्योंकि पाकिस्तानी-  संविधान के अनुसार पाकिस्तान कोई मजहबी इस्लामी देश नहीं है तथा विचार अभिव्यक्ति से लेकर धार्मिक स्वतंत्रता को वहा के संविधान के मौलिक अधिकारों में शामिल किया गया है इसके साथ-साथ अभी हाल में ही इसी  वर्ष मई के महीने में  में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी  द्वारा मानवाधिकार कानून पर हस्ताक्षर करने से वहा एक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कार्यरत है. भारतीयों को भी भारत में मुस्लिमो के रहने पर कोई आपत्ति नहीं थी. समय के साथ - साथ पाकिस्तान में हिन्दुओ की जनसँख्या का प्रतिशत का लगातार घटता गया और इसके विपरीत भारत में मुस्लिम-जनसँख्या का प्रतिशत लगातार बढ़ता गया.  इसके कारण पर विवाद हो सकता है परन्तु इसका एक दूसरा कटु पक्ष है. पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओ ने हिन्दुस्तान में शरण लेने के लिए पलायन शुरू किया जिसने विभाजन के घावों को फिर से हरा कर दिया. पर कोई अपनी मातृभूमि व जन्मभूमि से पलायन क्यों करता है यह अपने आप में एक गंभीर चिंतन का विषय है. क्योंकि मनुष्य का घर-जमीन मात्र एक भूमि का टुकड़ा न होकर उसके भाव-बंधन से जुड़ा होता है. परन्तु पाकिस्तान में आये दिन हिन्दू पर जबरन धर्मांतरण, महिलाओ का अपहरण, उनका शोषण, इत्यादि जैसी घटनाए आम हो गयी है.


ध्यान देने योग्य है कि अभी कुछ दिन पहले ही  पाकिस्तान  हिंदू काउंसिल के अध्यक्ष जेठानंद डूंगर मल कोहिस्तानी के अनुसार पिछले कुछ महीनों में बलूचिस्तान और सिंध प्रांतों से 11 हिंदू व्यापारियों सिंध प्रांत के और जैकोबाबाद से एक नाबालिग लड़की मनीषा कुमारी के अपहरण से हिंदुओं में डर पैदा हो गया है. वहा के  कुछ टीवी चैनलों के साथ - साथ पाकिस्तानी अखबार डॉन ने  भी 11 अगस्त के अपने संपादकीय में लिखा कि  ‘हिंदू समुदाय के अंदर असुरक्षा की भावना बढ़ रही है'  जिसके चलते जैकोबाबाद के कुछ हिंदू परिवारों ने धर्मांतरण, फिरौती और अपहरण के डर से भारत जाने का निर्णय किया है.  पाकिस्तान हिन्दू काउंसिल के अनुसार  वहां हर मास लगभग  20-25 लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराकर शादियां कराई जा रही हैं.  यह संकट तो पहले केवल बलूचिस्तान तक ही सीमित था, लेकिन अब इसने पूरे पाकिस्तान को अपनी चपेट में ले लिया है. रिम्पल कुमारी का मसला अभी ज्यादा पुराना नहीं है कि उसने साहस कर न्यायालय का दरवाजा  तो खटखटाया, परन्तु वहा की उच्चतम न्यायालय भी उसकी मदद नहीं कर सका और अंततः उसने अपना हिन्दू धर्म बदल लिया. हिन्दू पंचायत के प्रमुख बाबू महेश लखानी ने दावा किया कि कई हिंदू परिवारों ने भारत जाकर बसने का फैसला किया है क्योंकि यहाँ की  पुलिस अपराधियों द्वारा फिरौती और  अपहरण के लिए निशाना बनाए जा रहे हिंदुओं की मदद नहीं करती है. इतना ही नहीं पाकिस्तान से भारत आने के लिए 300 हिंदू और सिखों के समूह  को पाकिस्तान ने  अटारी-वाघा बॉर्डर पर रोक कर सभी से वापस लौटने का लिखित वादा लिया गया.  इसके बाद ही इनमें से 150 को भारत आने दिया गया. पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओ पर की जा रही बर्बरता को देखते हुए हम मान सकते है कि विश्व-मानवाधिकार पाकिस्तान में राह रहे हिन्दुओ के लिए नहीं है यह सौ प्रतिशत सच होता हुआ ऐसा प्रतीत होता है. समय पर विश्व मानवाधिकार ने इस गंभीर समस्या पर कोई संज्ञान नहीं लिया यह अपने आप में विश्व मानवाधिकार की कार्यप्रणाली और उसके उद्देश्यों की पूर्ति पर ऐसा कुठाराघात है जिसे  इतिहास कभी नहीं माफ़ करेगा.


यह भारत की बिडम्बना ही है कि अपने को पंथ-निरपेक्ष मानने वाले भारत के राजनेता और मीडिया के लोग हिन्दू का प्रश्न आते ही क्रूरता का व्यवहार करने लग जाते है. पाकिस्तान द्वारा हिन्दुओ पर हो रही ज्यादतियों पर संसद में सभी दलों के नेताओ ने एक सुर में पाकिस्तान की आलोचना तो की जिस पर भारत के विदेश मंत्री ने सदन को यह कहकर धीरज बंधाया कि वे इस  मुद्दे पर पाकिस्तान से बात  करेंगे परन्तु पाकिस्तान से बात करना अथवा संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को उठाना तो दूर यूंपीए सरकार ने इस मसले को ही ठन्डे बसते में डाल दिया और आज तक एक भी शब्द नहीं कहा. अगर यही मसला भारत में अथवा किसी अन्य देशो में रह रहे मुसलमानों के साथ हुआ होता तो अब तक का परिदृश्य ही कुछ और होता. खिलाफत - आन्दोलन और अलास्का को हम उदाहरण स्वरुप मान सकते है. पाकिस्तान में न सही किन्तु भारत की संसद, सरकार , मीडिया के लोगो में तो हिन्दू का बहुल्य ही है लेकिन अगर हम अपवादों को छोड़ दे तो शायद ही कभी देखने-सुनने का ऐसा सुनहरा अवसर आया हो कि राजनेताओ, पत्रकारों अथवा कोई हिन्दू संगठनो के समूह ने भारत सरकार पर हिन्दुओ के हितो की रक्षा के लिए दबाव बनाया हो. एक तरफ जहा  नेपाल सरकार द्वारा वहा घोषित हिन्दू-राष्ट्र के खात्मे पर सभी पंथ-निरपेक्षियों ने उत्सव मनाया तो वही भूटान से निष्कासित हिन्दुओ के विषय पर चूप्पी साध ली.  इनसे कोकराझार और कश्मीर के हिन्दुओ के हितो की बात करना तो दूर उन पर हो रहे अत्याचारों तक की बात करना ही व्यर्थ है. तो क्या यह मान लिया जाय कि भारत के साथ - साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान इत्यादि देशो में रहने वाले हिन्दू अपने हिन्दू होने की सजा भुगत रहे है और उनके लिए मानवाधिकार की बात करना मात्र एक छलावा है

Saturday, December 25, 2010

                नये साल के लिए एक जनवरी ही क्यों !



एक जनवरी के नजदीक आते ही जगह-जगह हैप्पी न्यू ईयर के बैनर व होर्डिंग लगने लगते हैं। जश्न मनाने की तैयारियां प्रारम्भ हो जाती हैं। होटल, रेस्तरॉ, व पव इत्यादि अपने-अपने ढंग से इसके आगमन की तैयारियां करने लगते हैं। पोस्टर व कार्डों की भरमार के साथ दारू की दुकानों की भी चांदी कटने लगती है। कहीं कहीं तो जाम से जाम इतने टकराते हैं कि घटनाऐं दुर्घटनाओं में बदल जाती हैं और मनुष्य- मनुष्यों से तथा गाड़ियां गाडियों से भिडने लगते हैं। रात-रात भर जाग कर नया साल मनाने से ऐसा प्रतीत होता है मानो सारी खुशियां एक साथ आज ही मिल जायेंगी। हम भारतीय भी पश्चिमी अंधानुकरण में इतने सराबोर हो जाते हैं कि उचित अनुचित का बोध त्याग अपनी सभी सांस्क्रतिक मर्यादाओं को तिलांजलि दे बैठते हैं। पता ही नहीं लगता कि कौन अपना है और कौन पराया।
जनवरी से प्रारम्भ होने वाली काल गणना को हम ईस्वी सन् के नाम से जानते हैं जिसका सम्बन्ध ईसाई जगत् व ईसा मसीह से है। इसे रोम के सम्राट जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म के तीन वर्ष बाद प्रचलन में लाया गया। भारत में ईस्वी सम्वत् का प्रचलन अग्रेंजी शासकों ने 1752 में किया। अधिकांश राष्ट्रों के ईसाई होने और अग्रेंजों के विश्वव्यापी प्रभुत्व के कारण ही इसे विश्व के अनेक देशों ने अपनाया। 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से प्रारम्भ होता था किन्तु 18वीं सदी से इसकी शुरूआत एक जनवरी से होने लगी। ईस्वी कलेण्डर के महीनों के नामों में प्रथम छः माह यानि जनवरी से जून रोमन देवताओं (जोनस, मार्स व मया इत्यादि) के नाम पर हैं। जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट जूलियस सीजर तथा उनके पौत्र आगस्टस के नाम पर तथा सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत् के मासों के आधार पर रखे गये। जुलाई और अगस्त, क्योंकि सम्राटों के नाम पर थे इसलिए, दोनों ही इकत्तीस दिनों के माने गये अन्यथा कोई भी दो मास 31 दिनों या लगातार बराबर दिनों की संख्या वाले नहीं हैं।
ईसा से 753 वर्ष पहले रोम नगर की स्थापना के समय रोमन संवत् प्रारम्भ हुआ जिसके मात्र दस माह व 304 दिन होते थे। इसके 53 साल बाद वहां के सम्राट नूमा पाम्पीसियस ने जनवरी और फरवरी दो माह और जोड़कर इसे 355 दिनों का बना दिया। ईसा के जन्म से 46 वर्ष पहले जूलियस सीजन ने इसे 365 दिन का बना दिया। सन् 1582 ई. में पोप ग्रेगरी ने आदेश जारी किया कि इस मास के 04 अक्टूबर को इस वर्ष का 14 अक्टूबर समझा जाये। आखिर क्या आधार है इस काल गणना का ? यह तो ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होनी चाहिए।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् नवम्बर 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद के द्वारा पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गयी। समिति ने 1955 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में विक्रमी संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश की थी। किन्तु, तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियन कलेण्डर को ही सरकारी कामकाज हेतु उपयुक्त मानकर 22 मार्च 1957 को इसे राष्ट्रीय कलेण्डर के रूप में स्वीकार कर लिया गया।
ग्रेगेरियन कलेण्डर की काल गणना मात्र दो हजार वर्षों के अति अल्प समय को दर्शाती है। जबकि यूनान की काल गणना 3579 वर्ष, रोम की 2756 वर्ष यहूदी 5767 वर्ष, मिस्त्र की 28670 वर्ष, पारसी 198874 वर्ष तथा चीन की 96002304 वर्ष पुरानी है। इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 109 वर्ष है। जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में एक-एक पल की गणना की गयी है।
जिस प्रकार ईस्वी सम्वत् का सम्बन्ध ईसा जगत से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मुहम्मद साहब से है। किन्तु विक्रमी सम्वत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न हो कर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रह्माण्ड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्माण्ड के सबसे पुरातन ग्रंथ वेदों में भी इसका वर्णन है। नव संवत् यानि संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27वें व 30वें अध्याय के मंत्र क्रमांक क्रमशः 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है। विश्व में सौर मण्डल के ग्रहों व नक्षत्रों की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं।
इसी वैज्ञानिक आधार के कारण ही पाश्चात्य देशों के अंधानुकरण के बावजूद, चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो, जन्म की बात हो, नामकरण की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार प्रारम्भ करने की बात हो, सभी में हम एक कुशल पंडित के पास जाकर शुभ लग्न व मुहूर्त पूछते हैं। और तो और, देश के बडे से बडे़ राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इंतजार करते हैं जो कि विशुद्ध रूप से विक्रमी संवत् के पंचांग पर आधारित होता है। भारतीय मान्यतानुसार कोई भी काम यदि शुभ मुहूर्त में प्रारम्भ किया जाये तो उसकी सफलता में चार चांद लग जाते हैं। वैसे भी भारतीय संस्कृति श्रेष्ठता की उपासक है। जो प्रसंग समाज में हर्ष व उल्लास जगाते हुए एक सही दिशा प्रदान करते हैं उन सभी को हम उत्सव के रूप में मनाते हैं। राष्ट्र के स्वाभिमान व देश प्रेम को जगाने वाले अनेक प्रसंग चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से जुडे़ हुए हैं। यह वह दिन है जिस दिन से भारतीय नव वर्ष प्रारम्भ होता है। आईये, इस दिन की महानता के प्रसंगों को देखते हैं -
ऐतिहासिक महत्व
1       यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है। इस दिन से एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 109 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की।
2       विक्रमी संवत का पहला दिन: उसी राजा के नाम पर संवत् प्रारंभ होता था जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो, और न ही कोई भिखारी हो। साथ ही राजा चक्रवर्ती सम्राट भी हो। सम्राट विक्रमादित्य ने 2067 वर्ष पहले इसी दिन राज्य स्थापित किया था।
3       प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक दिवस : प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिये चुना।
4       नवरात्र स्थापना : शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात्, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन।
5       गुरू अंगददेव प्रगटोत्सव : सिख परंपरा के द्वितीय गुरू का जन्म दिवस।
6       आर्य समाज स्थापना दिवस : समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
7       संत झूलेलाल जन्म दिवस : सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।
8       शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस : विक्रमादित्य की भांति शालिनवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।
9       युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन : 5112 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।
10    डा0 केशव राव बलीराम हैडगेबार जन्म दिवस : राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक थे।

प्राकृतिक महत्व
1     वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
2     फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
3     नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।
क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके। आइये! विदेशी को फैंक स्वदेशी अपनाऐं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही मनायें तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार करें।